సాయి వాణి :విశ్వాసం తో నన్ను నమ్ము. నిన్ను అన్ని వైపుల నుండి రక్షించేదను . నాపై నమ్మకం కలవారికి జయము కలుగును.

बप्पा जी लक्ष्मण कुलर्कणी के बाबा के अनुभव

श्रीबाप्पा जी को बचपन से ही बाबा का सानिध्य प्राप्त हुआ। वे अपनधिकतर समय बाबा के साथ बिताते। उन्हें द्वारकामाई में आने-जाने की छूट थी। बाबा भी उन्हें प्रेम करते। वे अक्सर एक-दूसरे के साथ खेला करते !उन्होंने
सन् 1910 से बाबा की सेवा आरंभ की।। इन्हें देवी देवताओं अच्छा ज्ञान था।।
उन्होंने कहा कि बाबा के दोनों कान छिदे थे और उनमें बड़े-बड़े छेद थे। श्री साईं बाबा पूर्वजन्म पर विश्वास करते थे। कुछ भक्तों से बातें करते हुए उन्होंने कहा था
“उनका मेरा अनेक जन्मों का संबंध है।श्री साई बाबा जब चावड़ी में रहते थे, तब उस जगह शेजारती होती थी!
जो भक्त श्री ज्ञानेश्वर और तुकाराम महाराज की आरतियाँ गाते थे। इस समय नमस्कार करते थे, यह बात शेजारती में उपस्थित भक्त कहते हैं।
एक दिन श्री बाप्पाजी के बीमारी का शिकार हो गए। वे अ

बाबा स्वयं उनके घर गए और बेटे के तर पर हाथ फेरने लगे। बाद में बाबा द्वारकामाई लौट आए। बाप्पाजी को
आराम मिलने लगा। उस दिन के बाद लक्ष्मण राव बाबा को भगवान-रुप मानने लगे। इनका परिवार उसी घर में रहता है जिसमें बाबा ने साक्षात्कार कर इन्हें स्वस्थ किया था। यह घर विट्ठल मंदिर के पीछे है।
तात्या साहेब नूलकर मधुमय के कारण कष्टदायक विषैले फोड़े से दुखी थी और बाबा के दर्शन हेतु जाने में असमर्थ थे। बाबा के दर्शन उनके मन में तीव्र इच्छा थी। उस शाम बाप्पा जी बाबा के साथ द्वारकामाई गए। कुछ बच्चे उस समय बाबा को चिढ़ा रहे थे। तभी एक कपड़े बेचने आया। बाप्पाजी ने कपड़े देखे और बाबा को एक कपड़ा खरीद
देने के लिए कहा। बाबा ने हाँ कहा और एक लाल ज़री-दार किनारे वाला खरीद बाप्पाजी के सिर पर बाँधा। बाबा ने मज़ाक करते हुए उनके गाल खींचा
। बाप्पाजी ने वस्त्र अपने सिर से उतारकर बाबा के सिर पर रखा। बाबा ने बच्चे की भांति वह वस्त्र वापिस बाप्पा जी के सिर पर रखा। ऐसा कुछ देर तक चला। महान् आश्चर्य! तात्या साहेब यह दृश्य साठे वाड़ा में बैठ-बैठे देखा
जवान बाप्पा अक्सर द्वारकामाई की दीवार के साथ टेक लगाकर बैठते। जब हंडी से अन्नदान करते तो बाप्पा प्रसाद मिलने की प्रतीक्षा करते। उन्होंने साईं बाबा
को मीठे चावल बनाते देखा। बाबा बिना कड़छी, भोजन पकाते और हंडी बलते भोजन को अपने हाथ से हिलाते-मिलाते। न तो उन्हें दर्द का एहसास था और न ही उनका हाथ जलता था। कई बार बाबा सोलह पदारी पोली बनाते और उसे धूनी पर सेंकते।
स्नान के समय बाबा ठंडे-गर्म पानी के बर्तन मँगवाते और नहाते

बाबा प्रतिदिन पाँच सौ रुपये बाँटते। बय्याजी को धूनी की लकड़ी खरीद ने के लिए दस रुपये देते। रामचन्द्र दादा को पंद्रह रुपये गन्ने के लिए मिलते। बाब अक्सर कहते “सब पैसे के भाई। अपना कोई नहीं।”
स्वतंत्रता के मंत्र को उज्ज्वल करने वाले और महाराष्ट्र की परंपरा कोजीवित रखने वाले लोकमान्य तिलक जब शिरडी आए, तब उन्होंने बाबा को फूलों का हार अर्पित किया। उस समय बाबा ने आशीर्वाद रूप में अपने हाथ
से एक नारियल तिलक को दिया। यह प्रसंग बाप्पाजी ने स्वयं देखा।
जब बाबा ने 15.10.1918 को महासमाधि ली, तब बाप्पाजी द्वारकामाई उनके पास थे। बाबा ने वहाँ उपस्थित भक्तों को घर भेजा लेकिन कुछ भक वहीं रुक गए। बाप्पाजी उनमें से एक थे।

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